हम खो न जाएं कहीं


-राजेश बैरागी-
यदि विचार उचित समय और स्थान पर प्रकट न किये जाएं तो उनकी अकाल मृत्यु निश्चित है। ऐसे अनेक विचार समय के कफन में लिपटकर काल कवलित हो गये जिन्हें आना चाहिए था और फैलना भी चाहिए था। जबकि अनुचित समय और स्थान पर उजागर होने वाले विचारों की भरमार रहती है। विचारों का प्रकटन औचित्य को नकार कर वक्ता की जरूरत बन गए हैं। अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु जरूरत बेजरूरत,समय असमय प्रकट किये जाने वाले विचारों ने विचार विनिमय के मार्गों को संकुचित व अवरोधों में बदल दिया है। सुविचार अनर्गल प्रलापों की भीड़ में उलझ पुलझ गये हैं। ऐसा क्यों हुआ?हम अतीत में खोजें तो वक्ताओं की संख्या श्रोताओं की अपेक्षा कम रहती रही है।गुरूकुलों, संघों, सत्संग में एक वक्ता सैकड़ों और हजारों लोगों को संबोधित करता था। उसके विचारों की समीक्षा जनमानस निजी अथवा समूह में करता था।आज स्थिति विपरीत है।हम सब वक्ता बन चुके हैं।हम किसी की नहीं सुनते।हम या तो किसी के अंधभक्त हैं या अंधविरोधी। इससे विचारों का विनिमय एकाएक रुक सा गया है। यह बेहद गंभीर स्थिति है। जिस देश प्रान्त में नागरिक सुनने की क्षमता खो देते हैं वहां विचार शून्यता का संकट उत्पन्न हो जाता है। इसका नुकसान वर्तमान और भविष्य दोनों को होता है।हम शायद इसी संकटकाल से गुजर रहे हैं।(नेक दृष्टि हिंदी साप्ताहिक नौएडा)